मुख्यमंत्री को गिरफ्तार किया था इस महिला आईपीएस ने, 2017 तक 41 ट्रांसफर झेले, अवार्ड भी वापस लौटाया

आज जिस आईपीएस ऑफिसर की कहानी हम आपको बताने जा रहे हैं, वो महज एक शख्स की कहानी नहीं है. ये कहानी है खाकी के प्रति जुनून की. ये कहानी है अपने कर्तव्य के प्रति समर्पण की. ये कहानी है असल महिला सशक्तिकरण की. ये कहानी है आईपीएस अधिकारी दिवाकर रूपा की. एक ऐसी महिला पुलिस ऑफिसर जिसने अपना कर्तव्य निभाते हुए अपने मन से हर तरह का भय निकाल दिया.D. Roopa (रूपा दिवाकर मौदगिल) कर्नाटक कैडर के 2000 बैच की आईपीएस अधिकारी हैं. इस समय डी रूपा बंगलूरू में पोस्टेड हैं. यहां ये रेलवे पुलिस में इंस्पेक्टर जनरल के पद पर स्थापित हैं. इससे पहले रूपा ने होम गार्ड एंड एक्स ऑफिसिओ अडिशनल जनरल, सिविल डिफेंस में अडिशनल कमांडेंट के पद पर थीं. इसके साथ ही इन्होंने ट्रैफिक एंड रोड सेफ्टी विभाग में कमिश्नर का पद संभला. रुपा कर्नाटक जेल विभाग की डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल भी रहीं राजनीति में गहरी दिलचस्पी रखने वालों के लिए आईपीएस रूपा का नाम नया नहीं होगा. इनके नाम बड़े बड़े नेताओं के साथ जुड़े, लेकिन ये जुड़ाव दोस्ताना नहीं था बल्कि इन सभी नेताओं के लिए एक तरह से काल साबित हुईं डी रूपा. फिर चाहे वो कभी मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी उमा भारती हों या फिर जयललिता की खासम खास शशिकला.

रूपा ने किसी के साथ नर्मी नहीं बरती. इसके साथ ही डी रूपा की एक विशेष पहचान भी है. आपको बता दें कि डी रूपा देश की पहली महिला पुलिस अधिकारी हैं जिन्हें 2013 में पुलिस डिविजन में साइबर क्राईम की कमान सौंपी गई थी. आईपीएस दिवाकर रूपा का जन्म कर्नाटक के देवणगेरे में हुआ. इनके पिता जे एस दिवाकर एक इंजीनियर थे, जो अब रिटायर हो चुके हैं. रूपा का बचपन देवणगेरे में ही बीता.

बचपन से ही ये पढ़ाई में आगे रही हैं. इन्होंने कुवेंपु विश्वविद्यालय से अपना ग्रेजुएशन पूरा किया. रूपा ने ग्रेजुएशन में गोल्ड मैडल जीता था. इसके बाद इन्होंने बेंगलूर विश्वविद्यालय से साईक्लॉजी में एम ए पूरा किया. एम ए के बाद रूपा ने नेट जेआरएफ का एग्ज़ाम क्लियर किया और साथ साथ यूपीएससी की तैयारी में भी जुटी रहीं. IAS बन सकती थीं, लेकिन IPS को चुना रूपा का सपना था कि वह आईपीएस बनें इसीलिए जेआरएफ में नौकरी मिलने के बाद भी वह यूपीएससी की तैयारियों में जुटी रहीं. मेहनत रंग लाई और उस समय मात्र 24 साल की रूपा ने यूपीएससी क्लियर कर लिया जिसके बाद इन्होंने जेआरएफ की नौकरी छोड़ दी. रूपा ने ये पहले ही तय कर लिया था कि उन्हें पुलिस सेवा को ही चुनना है. यूपीएससी में रूपा का ऑल इंडिया 43 रैंक आया था.

इतने शानदार रैंक के साथ वह आराम से आईएएस बन सकती थीं, लेकिन इन्होंने आईपीएस ही चुना. एक मेधावी छात्रा और एक दबंग आईपीएस ऑफिसर होने के अलावा भी रूपा में अन्य कई प्रतिभाएँ छुपी हई हैं. रूपा एक बेहतरीन ट्रेंड भरतनाट्यम डांसर हैं. इसके साथ ही इन्होंने भारतीय संगीत की ट्रेनिंग भी ली है. रूपा ने बयालाताड़ा भीमअन्ना नामक कन्नड फिल्म में एक प्लेबैक सिंगर के रूप में गीत भी गाया है.

इन सबके साथ रूपा एक बेहतरीन शार्प शूटर रही हैं तथा शूटिंग में कई पुरस्कार भी जीते हैं. 2003 में रूपा की शादी मुनीश मुद्गील से हुई. मुनीश एक आईएएस अफसर हैं. रूपा और मुनीश के दो बच्चे हैं. रूपा की छोटी बहन रोहिणी दिवाकर 2008 बैच की आईआरएस ऑफिसर हैं तथा इस समय इनकम टेक्स विभाग में ज्वाइंट कमिश्नर के पद पर बनी हुई हैं.

सही मायनों में देखा जाए तो डी रूपा इस बात का प्रमाण हैं कि ये देश असल में अधिकारी ही सही से चला सकते हैं बशर्ते इसमें राजनेताओं की दखल बंद हो जाए. डी रूपा को ना अपने सीनियर अफसरों का डर है ना राजनेताओं का. इन्हें सिर्फ ईमानदारी से अपनी ड्यूटी करना भाता है. अगर बात गलत सही की हो तो रूपा जवाब देने से नहीं चूकती, फिर सामने चाहे जो भी हो. वी.के. शशिकला केस से सुर्खियां बटोरीं जैसे कि यही उदाहरण ले लीजिए. एक सांसद हैं प्रताप सिम्हा उन्होंने एक बार ट्वीटर पर एक आर्टिकल ट्वीट किया. जिसमें उन अफसरों के नाम थे जिन्होंने अपनी मनचाही जगह पर ट्रांसफर न मिलने पर अपना राज्य ही बदल लिया. इस लिस्ट में एक नाम डी रूपा का भी था. रूपा ने जब ये लिस्ट देखी तो इसका जवाब देने में उन्होंने ज़रा भी समय नहीं गंवाया.

इन्होंने सांसद महोदय को जवाब दिया कि ‘ब्यूरोक्रेसी को राजनीति से मुक्त रहने दीजिए जनाब. अफसरों को राजनीति में मत घसीटिए, क्योंकि आने वाले समय में इससे सिस्टम और समाज दोनों को ही कोई फायदा नहीं होगा.’ तो ऐसी हैं डी रूपा जिन्हें अपनी बात कहने में ज़रा भी हिचक या डर महसूस नहीं होता. वैसे तो डी रूपा का नाम ऐसे कई नामी लोगों के साथ जुड़ा जिनके खिलाफ, इन्होंने मोर्चा खोला था.किन्तु, सबसे अधिक चर्चा में जो केस रहा, वो था वी के शशिकला केस. ये 2017 की बात है. तब शशिकला अम्मा यानी जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके की जनरल स्क्रेट्री थीं. बाद में इन्हें इनके पद से हटा दिया गया तथा पार्टी से भी निष्काषित कर दिया गया. अब ये अपनी नई पार्टी ए एम एम के की जरनल स्क्रेट्री हैं. उन दिनों शशिकला जेल में थीं और डी रूपा जेल विभाग में डी आई जी के पद पर स्थापित थीं.

2017 में रूपा उस जेल का दौरा करने गई थी जहां शशिकला को रखा गया था. इस दौरान रूपा ने वो सब देखा जो बिल्कुल गलत था. इसके बाद रूपा द्वारा एक रिपोर्ट सबमिट की गई जिसमें आरोप था कि शशिकला को जेल में वीआईपी ट्रीटमेंट दिया जा रहा है. रूपा ने आरोप लगाया कि पांच जेल के कमरों के बराबर का बरामदा शशिकला के निजी कक्ष के तौर पर उसे दिया गया है.

इसके साथ ही रूपा ने खुलासा भी किया कि जेल में ही शशिकला के लिए एक अलग किचन तैयार किया गया है जहां उसका खाना बनता है. रूपा ने आरोप लगाया था कि इन सभी सुविधाओं के बदले जेल अधिकारियों को 2 करोड़ रु. दिए गए हैं. इतना ही नहीं, बल्कि रूपा ने सीनियर को भी नहीं छोड़ा. उन्होंने जेल विभाग के डीजीपी सत्यनारायण राव पर ये आरोप लगाया था कि वह उनके काम में बाधा डाल रहे हैं.

इसके साथ ही रूपा का यह भी आरोप था कि जेल में कई तरह की अवैध गतिविधियां होती हैं. उनके मुताबिक, उन्होंने 25 कैदियों का ड्रग टेस्ट कराया था जिसमें 18 कैदियों टेस्ट पॉजिटिव आए थे.

शशिकला केस के अलावा रूपा ने फेक पेपर स्टैंप केस में दोषी पाए गए अब्दुल करीम तेलगी को मिल रही स्पेशल ट्रीटमेंट का भी भांडाफोड़ किया था. रूपा ने बताया था कि अब्दुल जिस समय जेल लाया गया था तब वह व्हीलचेयर पर था और इस व्हीलचेयर को चलाने के लिए उसे अलग से एक आदमी दिया गया था. रूपा ने यह भी आरोप लगाया कि वह जेल में 4 लोगों से मालिश करवाता था.

छोटे मोटे नेताओं की बात छोड़िए डी. रूपा ने तो मुख्यमंत्री तक को गिरफ्तार करने से पहले नहीं सोचा कि इसका अंजाम कितना खतरनाक हो सकता है. 2004 में उमा भारती मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री थीं. 2003 में जब वह मुख्यमंत्री बनीं तो उन पर 10 साल पुराने केस में गैरजमानती वारंट जारी हुआ. ये वारंट जारी किया था हुबली कोर्ट ने. उस समय रूपा कर्नाटक के धारवाड़ जिले की एसपी थीं.

वारंट मिलते ही रूपा मुख्यमंत्री उमा भारती को गिरफ्तार करने मध्यप्रदेश के लिए रवाना हो गईं. हालांकि गिरफ्तारी से पहले उमा भारती मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे चुकी थीं. उमा भारती पर सम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने का आरोप लगा था. कर्नाटक के हुबली में 15 अगस्त 1994 को उमा भारती ने यहां की एक ईदगाह में तिरंगा फहराया था.

इसी मामले में इन पर केस हुआ और दस साल बाद इनके नाम से गैरजमानती वारंट जारी हो गया. इस वारंट के बाद ही उमा भारती को अपना सीएम पद छोड़ना पड़ा था. एक पुलिस अधिकारी के रूप में रूपा ने कोर्ट का आदेश माना और एमपी जा कर उमा भारती को गिरफ्तार कर लिया. आइपीएस रूपा के कारनामों की लिस्ट इतनी जल्दी खत्म कहां होने वाली है.

2008 में रूप ने एक पूर्व मंत्री को गिरफ्तार कर के राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी थी. उन्होंने पूर्व मंत्री यवागल को गिरफ्तार किया था. इसी केस में इन्होंने अपने सबऑरडीनेट डीएसपी मसूटी को भी निलंबित कर दिया था. मसूटी पर यह आरोप थे कि उन्होंने लगातार यवागल से सम्पर्क बनाए रखा और उन्हें कई मामलों में बचाने का प्रयास भी किया.

एक समय ऐसा भी आया जब कर्नाटक का हर नेता रूपा के नाम से अच्छी तरह वाक़िफ़ हो गया. इसके पीछे एक बड़ी वजह थी. जब रूपा बेंगलुरु में डीसीपी के पद पर थीं तब इन्होंने 81 नेताओं की वी वी आई पी सेवाएं हटा दी थीं. इन नेताओं की सुरक्षा में 216 गनमैन शामिल थे जिन्हें रूपा के निर्देश पर हटा दिया गया. इन नेताओं की लिस्ट में मुख्यमंत्री येदियुरप्पा भी शामिल थे.

इसके साथ ही रूपा का यह भी आरोप था कि जेल में कई तरह की अवैध गतिविधियां होती हैं. उनके मुताबिक, उन्होंने 25 कैदियों का ड्रग टेस्ट कराया था जिसमें 18 कैदियों टेस्ट पॉजिटिव आए थे.

शशिकला केस के अलावा रूपा ने फेक पेपर स्टैंप केस में दोषी पाए गए अब्दुल करीम तेलगी को मिल रही स्पेशल ट्रीटमेंट का भी भांडाफोड़ किया था. रूपा ने बताया था कि अब्दुल जिस समय जेल लाया गया था तब वह व्हीलचेयर पर था और इस व्हीलचेयर को चलाने के लिए उसे अलग से एक आदमी दिया गया था. रूपा ने यह भी आरोप लगाया कि वह जेल में 4 लोगों से मालिश करवाता था.

छोटे मोटे नेताओं की बात छोड़िए डी. रूपा ने तो मुख्यमंत्री तक को गिरफ्तार करने से पहले नहीं सोचा कि इसका अंजाम कितना खतरनाक हो सकता है. 2004 में उमा भारती मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री थीं. 2003 में जब वह मुख्यमंत्री बनीं तो उन पर 10 साल पुराने केस में गैरजमानती वारंट जारी हुआ. ये वारंट जारी किया था हुबली कोर्ट ने. उस समय रूपा कर्नाटक के धारवाड़ जिले की एसपी थीं.

वारंट मिलते ही रूपा मुख्यमंत्री उमा भारती को गिरफ्तार करने मध्यप्रदेश के लिए रवाना हो गईं. हालांकि गिरफ्तारी से पहले उमा भारती मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे चुकी थीं. उमा भारती पर सम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने का आरोप लगा था. कर्नाटक के हुबली में 15 अगस्त 1994 को उमा भारती ने यहां की एक ईदगाह में तिरंगा फहराया था.

इसी मामले में इन पर केस हुआ और दस साल बाद इनके नाम से गैरजमानती वारंट जारी हो गया. इस वारंट के बाद ही उमा भारती को अपना सीएम पद छोड़ना पड़ा था. एक पुलिस अधिकारी के रूप में रूपा ने कोर्ट का आदेश माना और एमपी जा कर उमा भारती को गिरफ्तार कर लिया. आइपीएस रूपा के कारनामों की लिस्ट इतनी जल्दी खत्म कहां होने वाली है.

2008 में रूप ने एक पूर्व मंत्री को गिरफ्तार कर के राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी थी. उन्होंने पूर्व मंत्री यवागल को गिरफ्तार किया था. इसी केस में इन्होंने अपने सबऑरडीनेट डीएसपी मसूटी को भी निलंबित कर दिया था. मसूटी पर यह आरोप थे कि उन्होंने लगातार यवागल से सम्पर्क बनाए रखा और उन्हें कई मामलों में बचाने का प्रयास भी किया.

एक समय ऐसा भी आया जब कर्नाटक का हर नेता रूपा के नाम से अच्छी तरह वाक़िफ़ हो गया. इसके पीछे एक बड़ी वजह थी. जब रूपा बेंगलुरु में डीसीपी के पद पर थीं तब इन्होंने 81 नेताओं की वी वी आई पी सेवाएं हटा दी थीं. इन नेताओं की सुरक्षा में 216 गनमैन शामिल थे जिन्हें रूपा के निर्देश पर हटा दिया गया. इन नेताओं की लिस्ट में मुख्यमंत्री येदियुरप्पा भी शामिल थे.

इतना ही नहीं बल्कि रूपा ने एक पूर्व मुख्यमंत्री से उन 8 नई एसयूवी गाड़ियों को भी वापस ले लिया जो थीं तो पुलिस विभाग की लेकिन गैर सरकारी ढंग से उनका उपयोग पूर्व मुख्यमंत्री कर रहे थे. जब लौटा दिया था अपना अवार्ड अच्छे कामों को बहुत कम सराहना मिलती है. ऊपर से जब आप पुलिस विभाग में हों तो आपको हर कदम पर खुद को सही साबित करना पड़ता है. ऐसे में अगर कोई संस्था किसी पुलिस अधिकारी को अवार्ड दे कर सम्मानित करना चाहे तो ये उस अधिकारी के लिए खुशी का पल साबित हो सकता है. लेकिन डी रूपा के साथ ऐसा नहीं है. वो अवार्ड लेने से पहले उस बारे में गहराई तक सोचती हैं.

अगर अवार्ड उनके मन को नहीं जचता तो उसे लेने से मना भी कर देती हैं. रूपा ऐसा कर चुकी हैं. रूपा तब बेंगलुरु के होम गार्ड एंड सिविल डिफेन्स विभाग की पुलिस महानिरीक्षक थीं. ‘नम्मा बेंगलुरू फाउंडेशन’ नामक संस्था ने उन्हें एक विशेष अवार्ड के लिए नामांकित किया. इस पर रूपा को खुश होना चाहिए था. मगर इसके विपरीत रूपा ने संस्था का को एक पत्र लिख कर उनका आमंत्रण अस्वीकार करते हुए इस अवार्ड को ठुकरा दिया. नम्मा पिछले आठ साल से उन लोगों को ये अवार्ड देती आ रही थी, जिन्होंने राज्य को रहने लायक बनाने के प्रयास किए थे.

वह अवार्ड के साथ चुने हुए व्यक्तित्व को एक लाख नकद राशि भी देती थी. रूपा के समय इस संस्था ने पुरस्कार राशि को दोगुना कर दिया था. रूपा ने ये कहते हुए अवार्ड वापस कर दिया कि हर सरकारी कर्मचारी से अपेक्षा की जाती है कि वह तटस्थ रहे. जिन संस्थाओं के थोड़े से भी राजनीतिक ताल्लुकात हैं, उनसे समान दूरी बनाए रखने के साथ ही उनके प्रति तटस्थ भी रहना चाहिए.

केवल ऐसी स्थिति में ही लोक सेवक लोगों की नजरों में अपनी स्पष्ट और निष्पक्ष छवि बनाए रख सकते हैं। बता दें की ‘नम्मा बेंगलुरू फाउंडेशन’ राजीव चंद्रशेखर नामक एक बिजनेसमैन द्वारा फंड किया जाता है और राजीव एक पार्टी के राज्यसभा सदस्य थे. यही कारण था कि रूपा ने ये अवार्ड लेने से मना कर दिया. वहीं उस समय चुनाव भी नज़दीक थे इसी वजह से इन्होंने पुरस्कार व कैश रिवार्ड ठुकरा दिया. साल 2017 तक 41 ट्रांसफर झेले अगर आप ईमानदार हैं, तो आपको सराहना नहीं मिलेगी, बल्कि हर बार आपको अग्नि परीक्षा से गुज़रना पड़ेगा. वैसे ही जैसे रूपा को हर बार उनकी सच्ची ड्यूटी निभाने के बाद गुज़रना पड़ा. शशिकला केस ने जब तूल पकड़ा तो रूपा को भी इसका इनाम मिला. उनका तुरंत ही ट्रांसफर कर दिया गया. 2017 तक यानी कि 17 साल में रूपा के 41 ट्रांसफर हो चुके हैं.

इसके अलावा जिस डीजीपी सत्यनारायण राव पर रूपा ने ये आरोप लगाया था कि शशिकला को जेल में वीआईपी ट्रीटमेंट देने के बदले 2 करोड़ घूस ली गई है उसमें डीजीपी राव भी शामिल हैं, उसने रूपा पर 20 लाख की मानहानि का केस किया था. लेकिन इतना कुछ होने के बावजूद भी रूपा ने ना तो कभी अपने तेवर बदले और ना ही इन सियासतदानों के सामने झुकीं. बता दें कि रूपा 2016-17 में दो बार प्रेसिडेंट पुलिस मैडल द्वार सम्मानित की जा चुकी हैं.

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