फुर्सत में भी नहीं है फुर्सत के पल?

फुर्सत में भी नहीं है फुर्सत के पल?

महीनों से चल रहे लॉकडाउन फिर उसके बाद अनलॉक यानी फुर्सत फिर भी हमारे पास अपनों से बात करने की, उनकी खैर खबर लेने के पास फुर्सत नहीं है. क्योंकि अपनों से बात करना या उनके साथ समय बिताना भी हमें “वेस्ट ऑफ टाइम” लगता है. हम जल्द से जल्द अपना मोबाइल या लैपटॉप लपक लेते हैं. कि देखें डिजिटल वर्ल्ड में क्या चल रहा है. भले ही हमारे निजी रिश्ते कितने ही दूर क्यों न हो रहे हो, उन्हें ठीक करने पर उतना ध्यान नहीं देते हम, जितना डिजिटल वर्ल्ड के रिश्तो को सजाने पर देते हैं.

मूवी देखने या डिनर पर जाते हैं, तो सोशल साइट्स के चेक-इनस पर ही ध्यान ज्यादा रहता है इसके चलते वह जिंदगी की फुर्सत से दूर होते जा रहे हैं.

यह सही नहीं है की इंटरनेट की बदौलत ही हम सोशल साइट्स से जुड़ पाएं और उनके जरिए अपने वर्षों पुराने दोस्तों व रिश्तेदारों से फिर से कनेक्ट हो पाए, लेकिन कहीं न कहीं यह भी सच है की इन सबके बीच हमारे निजी रिश्तो और फुर्सत के पलों ने सबका खामियाजा भुगता है.

वर्किंग वूमेन के लिए भी अपने घर पर टाइम देना और फुर्सत के साथ परिवार के साथ समय बिताना कम ही संभव हो गया है लेकिन फिर भी कहीं ना कहीं वो मैनेज कर रहे हैं, पर जहां तक पुरुषों की बात आती है युवाओं का सवाल है, तो वह पूरी तरह इंटरनेट की गिरफ्त में है और वहां से बाहर निकलना भी नहीं चाहते ,यही नहीं आजकल जिन लोगों के पास इंटरनेट कनेक्शन नहीं होता या फिर जो लोग सोशल साइट्स पर नहीं होते , उन पर लोग हैरान होते हैं और हंसते हैं क्योंकि उन्हें आउटडेटेड व बोरिंग समझा जाता है.

रिसर्च बताते हैं कि सोशल साइट्स पर बहुत ज्यादा समय बिताना एक तरह का एडिक्शन है. यह एडिक्शन ब्रेन के उस हिस्से को एक्टिवेट करता है जो कोकीन जैसे नशीले पदार्थ के एडिक्शन पर होता है.

_ यूनिवर्सिटी ऑफ मिशीगन की एक स्टडी के मुताबिक जो लोग सोशल साइट पर अधिक समय बिताते हैं वह अधिक अकेलापन और अवसाद महसूस करते हैं, क्योंकि जितना अधिक वो ऑनलाइन इंटरेक्शन करते हैं, उतना ही उनका फेस टू फेस संपर्क लोगों से कम होता जाता है.

– यही वजह है कि इंटरनेट का अधिक इस्तेमाल करने वालों में स्ट्रेस ,निराशा ,डिप्रेशन और चिड़चिड़ापन लगता है. उनका नींद भी डिस्टर्ब रहता है वह अधिक थके-थके रहते हैं. ऐसे में जिंदगी का सुकून कहीं खो सा जाता है.

लोग यदि परिवार के साथ कहीं घूमने भी जाते हैं, तो उस जगह का मजा लेने की बजाय पिक्चर्स क्लिक करने के लिए बैकड्रॉप्स ढूंढने में ज्यादा समय बिताते हैं एक दूसरे के साथ क्वालिटी टाइम गुजारने की जगह सेल्फी क्लिक करने पर ही सबका ध्यान रहता हैं. जिससे यह फुर्सत के पल भी यूं ही बोझिल होकर गुर्जर जाते हैं और हमें लगता है की इतने घूमने के बाद ही रिलैक्स्ड नहीं कर रहे.

सार्वजनिक जगहों पर भी लोग एक दूसरे को देख कर अब मुस्कुराते नहीं क्योंकि सब की नजर अपने मोबाइल पर ही टिकी रहती है.

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